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PostSubject: for me   for me Empty2008-07-03, 21:31

लहरों की ज़िद पर क्यों वरना अपनी शक़्ल बदल लेतीं,
दिल जैसा कुछ होता होगा शायद इन चट्टानों में।
पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इन्सां पाए हैं,
तुम शहरे मुहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं।
मैंने मजनूँ पे लड़कपन में असद,
संग उठाया था कि सर याद आया।
वफा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा,
तो फिर ऐ संगदिल तेरा ही संगे आस्तां क्यों हो।
वो कह रहा था इसमें मेरा क्या कसूर है,
शीशे का घर था हाथ के पत्थर मचल गए।
इन्हीं पत्थरों पे चलकर अगर आ सको तो आओ,
मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नहीं है।
किसको कैसे पत्थर मारूँ कौन पराया है,
शीशमहल में इक इक चेहरा अपना लगता है।
पत्थर से आदमी के हैं रिश्ते बड़े अजीब,
ठोकर किसी ने मारी कोई जल चढ़ा गया।
पत्थर की सूरतें नज़र आती हैं चारसू,
यारब तेरे जहाँ को ये क्या दफ़अतन हुआ।
अहदे हाज़िर में शराफ़त नहीं जीने देगी,
फूल इक हाथ में इक हाथ में पत्थर रखना।
जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है,
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।
मैं शाहराह नहीं रास्ते का पत्थर हूँ,
यहाँ सवार भी पैदल उतर के चलते हैं।
जब साथ न दे कोई आवाज़ हमें देना,
हम फूल सही लेकिन पत्थर भी उठायेंगे।
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